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सदमा और भय (Best from magzines)

दोस्तों, learning for help अपने नए चरण के तहत "Best from magazines" शीर्षक के तहत उलब्ध करा रहा हैं,कुछ प्रमुख राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय पत्रिकाओं के कुछ प्रमुख अनुवादित आर्टिकल्स। इसी कड़ी में पेश हैं , प्रशिद्ध पत्रिका अंग्रेजी पत्रिका BUSINESS WORLD से लिया गया नोटबंदी पर आधारित आर्टिकल......
                SHOCK AND AWE
                   (सदमा और भय)
8 नवंबर को नरेंद्र मोदी सरकार की विमुद्रिकरण योजना ने देश को आपदा जैसे हालात में डाल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम काले धन पर 3 गुणा वार करता है। यह तीन तरह के उद्देश्यों को लिए हुए है जिनमें नकली मुद्रा के प्रवाह पर नजर बनाना , नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नजर बनाना और उत्तरोत्तर एक कैशलेस समाज की और ले जाता है।
                 यह विचार शुरू में पूणा में कार्यरत एक सामाजिक आर्थिक ngo अर्थ क्रांति के अनिल बोकल द्वारा दिया गया। स्वामी रामदेव औ IIM B के आर वैद्यनाथ भी इस विचार के प्रारंभिक प्रवर्तक माने जाते हैं। राजनीतिज्ञ में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू पहले शक्स थे जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को 500 एवं एक हजार के नोटो पर बैन लगाने की राय दी थी।
                 देश का विपक्ष किसी भी तरह इससे प्रभावित नहीं है विपक्ष की स्थिति को सर्वाधिक वाकपटुता के साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले हफ्ते राज्यसभा में दर्शाया जब उन्होंने कहा कि यह कदम जीडीपी को 2% तक नीचे ले जाएगा।
                  विपक्षी ने इस कदम के पीछे के बड़े उद्देश्यों पर भी सवाल उठाया है इन तर्कों के साथ की 90 प्रतिशत भारतीय अर्थव्यवस्था अनोपचारिक है और उसका 55% हमारी श्रमिकों का है जो कृषि क्षेत्र में संलग्न है। यह वह वर्ग है जो नोट बंदी से सर्वाधिक प्रभावित होगा।
                  आलोचक रुप में विपक्षी ने यह वितर्क दिया है कि भारत जो कि सारे विश्व में सकल घरेलू उत्पाद के रूप में सर्वाधिक नगदी रखता है मुख्य रुप से नगद लेन-देन पर निर्भर है और यह कदम अर्थात नॉट बंदी पूर्ण समझ से बाहर है। विपक्ष में यह भी तर्क दिया है कि काले धन का सिर्फ 6% ही वास्तव में नगद रूप में है और शेष ठोक झूठ के रूप में स्वर्ण ,संपत्ति और विदेशी संपत्ति के रूप में विद्यमान है।
                काली मुद्रा के प्रति तर्क ज्यादा प्रभावी नहीं होता आलोचकों का तर्क भारतीय सांख्यिकी संस्थान के वर्ष 2015 के अध्यन को भी सामने लाता है जिसमें बताया गया है कि मात्र 400 करोड की नकली मुद्रा ही सिस्टम में है। नोट गंदी के विरोध में बंद बुलाए गए हैं, और विपक्षी नेताओं को मौका दिया है कि वे ATM की लाइनों में शामिल होकर आक्रामक जनता की तरफ से एकजुटता दिखाएं।
                विपक्ष का नीचा दिखाने का भाव हालाँकि अत्यधिक गलत हो सकता है। पिछले हफ्ते बिज़नस वर्ल्ड के सर्वे में पाया गया कि भारतियों की भारी जनसंख्या 87% वास्तव में pm मोदी के इस कदम का समर्थन करता है। यदि विपक्ष यह सोचता है कि वह इसे आने वाले 2017 के राज्यों के चुनावों का चुनावी मुद्दा बना लेगा तो यह कुछ झटका देने वाले तथ्य हो सकते हैं। सर्वे में पाया गया कि 86 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या सोचती है कि इसमें कोई कठिनाई नहीं काले धन के खिलाफ परेशानी उठानी में। लगभग 54.8% ग्रामीण जनसंख्या सोचती है की pm मोदी का समर्थन नीचे चला जाएगा यदि वे ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के दबाव में आकर अपना कदम पीछे हटा लेते हैं।
               नौजवानों में मोदी के समर्थन में नाद सुनाई देने लगता है। यह कदम नंबर प्रतिशत से अधिक 25 वर्ष से कम आयु के लोगों के द्वारा समर्थित किया गया है।
                एक्सपर्ट कहते हैं कि वर्तमान में चल रहे नोटों को बदलने में मई 2017 तक का समय लग सकता है। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार को विजय पी की कोर सपोर्टर छोटे व्यापारियों के प्रतिरोध का भी सामना करना पड रहा है तथापि सरकारी प्रबंधक इस बारे में निश्चित है क़ी इस ऐतिहासिक फैसले से उन्हें पीछे नहीं देखना पड़ेगा। साथ ही है उत्तर प्रदेश चुनाव का प्रमुख मुद्दा बन गया है। मोदी के समर्थक यह भी तर्क दे रहे हैं  की मोदी की घोषणा पूर्व PM जवाहर लाल नेहरू द्वारा लोगों को भारत चीन युद्ध में अपने गहने दान करने और अन्य पूर्व PM लाल बहादुर शास्त्री द्वारा लोगों से एक समय का भोजन त्यागने की अगली कड़ी के समान ही हैं।
                लेकिन क्या विमुद्रिकरण का कदम अर्थव्यवस्था में सुधार का बड़ा प्रयास साबित होगा भले ही यह थोड़े समय के लिए प्रताड़ित करता है? बिजनेस वर्ल्ड ने हाल ही में स्थिति को साफ समझने के लिए चार बड़े अर्थशास्त्रियों के साथ चर्चा की। परिणाम लंबी अवधि के निदान पर विभाजित राय के रुप में सामने आया।
                 यदि भी मोदी का 8 नवंबर का कदम वाद विवाद पर आधारित हो सकता है जोकि समानांतर अर्थव्यवस्था के लिए अधिक सुधारों की दिशा में ठोस प्रयासों के झांज की मांग करता है। मोदी ने पहले ही गेंद को घुमा दिया है यह कहकर कि राज्य विधानसभा और लोकसभा चुनावों में स्टेट फंडिंग होती है चुनाव सुधार की दिशा मे एक बड़ा कदम साबित होगा  क्योंकि राजनीतिक भ्रष्टाचार ही काले धन का मूल कारण है।
              किन्तु यह बाबुओ और राजनीतिज्ञों को रिश्वत मांगने से नहीं रोक पायेगा। यह वकीलों,डॉक्टरों और इंजीनियरों को भी ईमानदारी से टैक्स भरने के लिए मजबूर नहीं कर पायेगा।
               टैक्स सुधार और मानक निर्धारित करना इस दिशा में एक नया स्वच्छ्ता मिशन होगा। मोदी को इस कदम को तार्किक परिणिति के साथ सफल बनाना होगा।
                          (Source- Business World)

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